धरती की बेटी भगवती देवी कैसे तय की पत्थर तोड़ने से संसद तक का सफर


एक जमाने में  सड़क किनारे पत्थर तोड़ने वाली भगवती देवी, वक़्त ने नहीं, खुद उन्होंने समय का पहिया ऐसा घुमाया कि देश के सिरहाने पहुंच गईं।


भगवती देवी, जिन्हें 'धरती की बेटी' के रूप में भी जाना जाता है, बिहार के गया जिले के बाराचट्टी क्षेत्र से थीं। वह महादलित समुदाय से आती थीं और अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए सड़क किनारे पत्थर तोड़ने का कार्य करती थीं। उनकी तीन बेटियाँ और एक पुत्र हैं; उनके पुत्र विजय कुमार मांझी राजनीति में सक्रिय हैं, और उनकी बेटी समता देवी भी विधायक रह चुकी हैं।

उनकी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1968 में हुई, जब समाजवादी नेता उपेंद्रनाथ वर्मा ने उन्हें मजदूरों के बीच भाषण देते हुए देखा। वर्मा ने उनकी नेतृत्व क्षमता को पहचाना और उन्हें डॉ. राम मनोहर लोहिया से मिलवाया। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक कार्यक्रम के दौरान, भगवती देवी ने 'हम न सहबो हो भइया, हम न सहबो हो' गीत गाया, जिससे प्रभावित होकर लोहिया ने उन्हें सोशलिस्ट पार्टी से बाराचट्टी विधानसभा सीट के लिए टिकट दिया। वह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं।

1977 में, उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर फिर से चुनाव जीता। हालांकि, 1980 में चुनाव हार गई। फिर1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें गया विधानसभा सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़वाया, जिसमें वह विजयी रहीं। इसके बाद, 1996 में, उन्हें गया लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया और वह सांसद चुनी गईं। 

भगवती देवी का जीवन संघर्ष और सफलता की मिसाल है। उन्होंने समाज के निचले पायदान से उठकर संसद तक का सफर तय किया, जिससे वह गरीबों और वंचितों की सशक्त आवाज बनीं। 

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