रोहित शर्मा की फिटनेस पर सवाल उठाना सही या बॉडी शेमिंग?


चैंपियंस ट्रॉफी में शानदार जीत के बाद भी रोहित शर्मा की फिटनेस पर निशाना आखिर क्यों?

खेल का मैदान खिलाड़ियों के प्रदर्शन को आंकने का सही पैमाना होता है, लेकिन जब खेल से इतर निजी टिप्पणियां होने लगें, तो विवाद खड़ा होना तय है।

 भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रोहित शर्मा को लेकर कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. शमा मोहम्मद के बयान ने यही दर्शाया। न्यूजीलैंड के खिलाफ भारत की जीत के बाद जब देश खुशी मना रहा था, तब उन्होंने रोहित की फिटनेस और कप्तानी पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह "मोटे" हैं और भारत के सबसे निराशाजनक कप्तान हैं।

 यह टिप्पणी राजनीतिक गलियारों में विवाद का कारण बनी और भाजपा ने इसे बॉडी शेमिंग और एक सेल्फमेड चैंपियन का अपमान करार दिया। बाद में कांग्रेस को हस्तक्षेप करना पड़ा और शमा को अपने ट्वीट डिलीट करने पड़े।  

क्या रोहित की फिटनेस और कप्तानी पर सवाल उठाना सही है?  

रोहित शर्मा भारतीय क्रिकेट के दिग्गज खिलाड़ियों में शुमार हैं। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण जीत दर्ज की हैं, और उनकी बल्लेबाजी क्षमता किसी से छिपी नहीं है। यह सही है कि खेल में फिटनेस का महत्व बहुत अधिक होता है, लेकिन किसी खिलाड़ी के वजन को आधार बनाकर उनकी काबिलियत पर सवाल उठाना क्या उचित है?  

शमा मोहम्मद ने अपनी टिप्पणी में रोहित की तुलना सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली, महेंद्र सिंह धोनी और अन्य पूर्व दिग्गजों से की, यह कहते हुए कि रोहित "औसत दर्जे" के कप्तान हैं, जिन्हें बस किस्मत से टीम की कमान मिल गई। इस तरह की तुलना करना सही नहीं होगा क्योंकि हर खिलाड़ी की नेतृत्व शैली और योगदान अलग होता है। क्या केवल आंकड़ों के आधार पर किसी कप्तान को अच्छा या बुरा ठहराना सही है? अगर ऐसा होता, तो कई महान कप्तानों को उनके करियर के शुरुआती दौर में ही नाकाम माना जा सकता था।  

खेल मंत्री और कांग्रेस का रुख

इस विवाद के बढ़ने के बाद खेल मंत्री मनसुख मंडविया ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और टीएमसी को खिलाड़ियों को अकेला छोड़ देना चाहिए और उनकी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाने से बचना चाहिए। यह सच है कि खिलाड़ी देश के लिए खेलते हैं और वे अपने प्रदर्शन को लेकर सबसे ज्यादा सजग होते हैं। इस तरह की टिप्पणियां न केवल उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं, बल्कि उनके प्रयासों को भी कमतर दिखाने का काम करती हैं।  

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को भी यह मामला संभालने के लिए सामने आना पड़ा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी खेल हस्तियों का सम्मान करती है और शमा मोहम्मद के बयान कांग्रेस की विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्हें अपने बयान हटाने को कहा गया और भविष्य में ज्यादा सावधानी बरतने की सलाह दी गई।  

क्या चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान ऐसी बयानबाजी उचित थी? 

भारतीय टीम जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमा रही हो, तब इस तरह की बयानबाजी टीम के मनोबल पर असर डाल सकती है। आलोचना खेल का हिस्सा है, लेकिन जब यह व्यक्तिगत टिप्पणियों का रूप ले ले, तो खेल भावना को ठेस पहुंचती है। शमा मोहम्मद ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनका इरादा अपमान करना नहीं था, लेकिन यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सार्वजनिक मंच पर दिए गए बयान का असर व्यापक होता है।  

एक खिलाड़ी की आलोचना उनके खेल प्रदर्शन पर होनी चाहिए, न कि उनकी शारीरिक बनावट या किसी और व्यक्तिगत पहलू पर। क्या हम सचिन तेंदुलकर, वीरेंद्र सहवाग या अन्य महान खिलाड़ियों को उनके शरीर के आधार पर आंक सकते हैं? नहीं, क्योंकि क्रिकेट सिर्फ फिटनेस का खेल नहीं, बल्कि तकनीक, मानसिक मजबूती और अनुभव का खेल भी है।  

राजनीतिक गलियारों में खेल से जुड़े मामलों पर बयानबाजी अक्सर विवादों को जन्म देती है, और यह घटना भी इसका उदाहरण है। चैंपियंस ट्रॉफी के बीच इस तरह की बयानबाजी से बचना जरूरी था, क्योंकि यह टीम के प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। अगर आलोचना करनी ही है, तो वह उनके खेल और रणनीति पर होनी चाहिए, न कि उनके शरीर के आकार या किस्मत के आधार पर।  


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