सुपरमैन कुछ भी नहीं है, क्योंकि मैं एक सुपरवुमन हूं। कम से कम समाज तो यही चाहता है कि मैं ऐसी बनूं।
हम महिलाओं को तब सराहा और प्रशंसा की जाती है जब हम सबकुछ संभालने में सक्षम होती है।एक सफल करियर, एक परिवार और साथ ही समाज की वह "आदर्श" महिला बनने की कोशिश करती हैं, जो शिक्षित तो हो लेकिन अधिक मुखर न हो, जो अपने पति से अधिक कमाने की इच्छा न रखे लेकिन घर की आर्थिक ज़रूरतों में योगदान दे सके, और जब जरूरत पड़े तो अपने सपनों को त्यागकर परिवार को प्राथमिकता देने के लिए तैयार रहे।
नीलांजना भौमिक अपनी पुस्तक “Lies Our Mothers Told Us” में उन दो सबसे हानिकारक आदतों के बारे में बात करती हैं, जिनका शिकार अधिकांश महिलाएं होती हैं। लोगों को खुश करने की आदत और "सबकुछ हासिल करने" की कोशिश। अधिकांश महिलाएं इस बात से जुड़ाव महसूस करेंगी कि कैसे उन्होंने हमेशा खुद को दूसरों की अपेक्षाओं में ढालने की कोशिश की, और इस प्रक्रिया में वे यह भूल गईं कि वे वास्तव में कौन हैं। यही सुपरवुमन सिंड्रोम है।
मैंने भी अपने जीवन की अधिकांश महिलाओं से यही सीखा है। सबकुछ हासिल करना, हर भूमिका को निभाना, ताकि यह साबित कर सकूं कि मैं अपने सपनों को पूरा करने के योग्य हूं, साथ ही अपनी पारंपरिक ज़िम्मेदारियों को भी निभा सकूं, और जब समय आए तो परिवार के लिए सबकुछ छोड़ने के लिए भी तैयार रहूं। महिलाएं हमेशा संतुलन बनाने की इस जंग को लड़ती हैं। एक तरफ पेड वर्क यानी पेशेवर कार्य और दूसरी तरफ अनपेड वर्क यानी घर और परिवार की देखभाल। यह सब बिना किसी संस्थागत या पारिवारिक सहयोग के, और कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना करते हुए। समाज इसे महिलाओं की "सुपरपावर" के रूप में देखता है। अगर कोई महिला इसे नहीं कर पाती, तो उसे विफल माना जाता है।
सुपरवुमन सिंड्रोम की शुरुआत
सुपरवुमन सिंड्रोम, जो 1980 के दशक में नारीवादी विमर्श का हिस्सा बना, वास्तव में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता का एक प्रतिफल है। डॉ. मार्जोरी हैंसन चावेज़ ने अपनी पुस्तक के माध्यम से इस अवधारणा को प्रस्तुत किया। यह शब्द उन सामाजिक दबावों को दर्शाता है, जिनमें महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे एक साथ कई भूमिकाओं में उत्कृष्टता हासिल करें। एक पेशेवर, माँ, पत्नी, दोस्त और बेटी के रूप में। और वह भी उच्च मानकों के साथ। इस निरंतर जूझने की प्रक्रिया में महिलाएं अपनी खुद की भलाई को नज़रअंदाज़ करने लगती हैं, जिससे तनाव, चिंता और थकावट जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।
हमने शिक्षा और कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी तो बढ़ा ली है, लेकिन हमने अपने अंदर जमीं पूर्वाग्रहों को मिटाने और महिलाओं के लिए एक बेहतर प्रणाली विकसित करने की दिशा में पर्याप्त काम नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि महिलाओं ने खुद भी इस संघर्ष को अपनी स्वतंत्रता की कीमत के रूप में स्वीकार कर लिया है। हम अपनी आर्थिक आज़ादी को अपना अधिकार मानने के बजाय इसे एक बंदिशों से भरा सौदा मानते हैं। अगर हमें बाहर जाकर काम करने की अनुमति दी जा रही है, तो हमें घर की ज़िम्मेदारियां भी बिना किसी शिकायत के निभानी होंगी।
सुपरवुमन सिंड्रोम के गहरे प्रभाव
इस सिंड्रोम के असर सिर्फ "सबकुछ हासिल करने" की कोशिश तक सीमित नहीं हैं। यह असफलता के डर से भी जुड़ा हुआ है। महिलाओं को असफल होने की अनुमति नहीं होती, क्योंकि अगर वे किसी चीज़ में विफल होती हैं, तो उन्हें यह कहकर हतोत्साहित कर दिया जाता है कि वे "इस योग्य नहीं थीं"। पुरुषों को गलतियाँ करने और उनसे सीखने का अवसर मिलता है, लेकिन महिलाओं के लिए एक विफलता का अर्थ है कि उन्हें कोशिश ही नहीं करनी चाहिए थी। एक सुपरवुमन कैसे असफल हो सकती है?
अगर कोई महिला अपने करियर में किसी कारणवश धीमी गति से आगे बढ़ने का फैसला करती है, तो उसे तुरंत "कमज़ोर" या "अक्षम" मान लिया जाता है। वहीं, अगर कोई महिला हाउसवाइफ बनना चाहती है, तो उसे "सिर्फ एक गृहिणी" कहकर उसकी मेहनत को नकार दिया जाता है। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट रूप से दिखाता है कि जो महिलाएं करियर पर ध्यान केंद्रित करती हैं, उन्हें "परिवार की उपेक्षा करने वाली" कहकर आलोचना झेलनी पड़ती है, और जो महिलाएं परिवार को प्राथमिकता देती हैं, उन्हें "आलसी" समझा जाता है। इस निरंतर सामाजिक दबाव के कारण महिलाओं में अत्यधिक तनाव और चिंता देखने को मिलती है।
सुपरवुमन सिंड्रोम से कैसे उबरा जाए?
इस मानसिकता को बदलने के लिए समाज और व्यक्तिगत स्तर पर बदलाव लाना बेहद ज़रूरी है। सबसे पहले, महिलाओं को यह स्वीकार करना होगा कि हर भूमिका में उत्कृष्टता प्राप्त करना अवास्तविक है और ऐसा करने की कोशिश में उनकी अपनी भलाई दांव पर लग सकती है। खुद की देखभाल करना, सीमाएं तय करना, कामों को बांटना और ना कहना सीखना।यह सभी चीजें महिलाओं को इस दबाव से मुक्त कर सकती हैं।
साथ ही, महिलाओं को इस बात का अपराधबोध महसूस करना बंद करना होगा कि वे "सबकुछ नहीं कर सकतीं"। हमें यह समझने की जरूरत है कि एक महिला की कीमत इस बात से तय नहीं होती कि वह कितनी भूमिकाओं को एक साथ निभा सकती है।
इसके अलावा, कार्यस्थलों और समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि महिलाओं को हर समय "सुपरवुमन" बने रहने की ज़रूरत नहीं है। कार्यस्थलों को अधिक लचीली कार्य-नीतियां अपनानी चाहिए, ताकि महिलाएं संतुलित जीवन जी सकें। साथ ही, परिवारों को भी महिलाओं की जिम्मेदारियों को समान रूप से साझा करने की आवश्यकता है।
सुपरवुमन सिंड्रोम से मुक्त होना सिर्फ महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है। जब हम महिलाओं पर से यह अनावश्यक दबाव हटाएंगे और उनकी मेहनत को सही मायनों में सराहेंगे, तभी महिलाएं स्वस्थ, खुशहाल और अधिक प्रभावशाली जीवन जी पाएंगी।
महिलाओं को हर समय सबकुछ संभालने की ज़रूरत नहीं है। असली ताकत इस बात में है कि वे अपने लिए क्या चुनती हैं।चाहे वह करियर हो, परिवार हो, या दोनों का संतुलन। हमें महिलाओं को उनकी चुनौतियों के बजाय उनके योगदान के लिए सराहना सीखनी होगी। यही असली नारी सशक्तिकरण है।
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